नहीं सलीका, अदब मुझे !!

है नहीं सलीका, अदब मुझे
बस बदमिजाजी है ।
क्या करूँ मेरा खुदा
इसी अदा पे राज़ी है ।

– इला रानी।

©इला रानी। All Rights Reserved

कामना मेरी

दिवस से निशि तक
भोर से सांझ तक
उद्गम से अंत तक
सरिता से सागर तक
तुम्हारी बातों कि स्याही बना
अपने भावों को शब्दों में पिरो
वितान की चादर ओढ़
कली की ओट ले
कविता लिखूँ मैं
यही कामना मेरी ।
यही कामना मेरी ।

©Ila Rani.All Rights Reserved.

सिखलाता है समय

सिखलाता है समय की,

अनंत में विलीन देह के भी

विचार सुवासित हैं ।

प्रतिमाओं में संजोयी गयी हैं विरासतें ।

अक्षरसः ,गीत कंठस्थ हैं ।

लेकिन कर्मठता को छोड़ चले जो,

जो पथ से भूले – भटके हैं ,

उनके निशां कहीं नहीं हैं।

कहीं नहीं हैं।

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एक बीता हुआ पल

मैं राह से गुज़री
की वो लम्हा मुझसे गुजर गया ?!
मैंने कहा -रुको ! तो वो
किसी बूंद सा ठहर गया।।

वो वक़्त इतना खास था
था मस्तियों का कारवां ।
बस याद आने भर से ही
अश्कों का प्याला भर गया ।

मैंने कहा -रुको ! तो वो
किसी बूंद सा ठहर गया।।

ज़ाया किया था उम्र का
एक सुनहरा पल यहां।
सिलवटों से हैं भरे,
हैं तो सही उसके निशां।

मैं लौटना चाहूँ भी तो
हर राह अब सुनसान है
सब कोशिशें ज़ाया हुईं
और वो खुदा मुकर गया ।

मैंने कहा -रुको ! तो वो
किसी बूंद सा ठहर गया।।

©इला रानी।
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दोहा

किस्सागो सी जिंदगी
मुसाफिरी का काम।
शब से सहर तक फिर क्यों ना
जी को ज़रा आराम ?

©इला रानी।
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दोहा

हरी- हरी सब घास पे
बरसै बूंद हजार,
घिसलो साबुन ना धुले
मानुस का व्यवहार ।।

©इला रानी।
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आधा किस्सा

हिज्र की चादर तले
अरमान रो रहे हैं
और तुम्हें गुमान कितना
दरियादिली का है।
यह एक किस्सा है,
बस आधा हिस्सा है।

©इला रानी
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