एई मेघला…

एई मेघला, दिन एकला…..

अनुपम रॉय का ये सुंदर गीत मेरे मन में शहद की तरह घुल रहा है, हल्की फुहारों से भीगकर खिड़की के बाहर का गुलाब झूम रहा है, मेघों की साँवली चादर सारे आसमान को ढंक रही है….

जी चाहता है कि इन फुहारों की कुछ बूंदों को सहेज लूँ , मोतियों की तरह किसी माला में पिरो लूँ और हमेशा पहने रहूँ, तुम्हें मेरे हृदय के हर सपंदन में महसूस करूँ, तुम्हारी प्रेम मिश्रित करुण अभिव्यक्ति की भूतपूर्व क्षणों के सुनहरे सागर में डुबकियां लगाऊं…

फिर वर्षा तेज हो जाती है, तूफान में बदल जाती है, नेटवर्क चला जाता है, गीत रुक – रुक कर चलता है, और मुझे वास्तविकता का भान होता है , की कैसे मेरे सपनों के सुंदर घरोंदे को दामिनी ने डस लिया है, तुम किसी और सरहद पर बरसने को बेताब हो और मैं….

मैं बस स्वप्नों की दुनिया में घूम रही हूँ, नितांत अकेली…

©इला रानी।

© Ila Rani. All Rights Reserved.

The heart

When it goes blank,
All the light , sucked away
Into some wormhole
The soul ,cries ,fights to survive
Oh dear heart !
It’s you
It’s always you
Who leaps high
Who leaps further
And holds
And lets it behold
The stars
That glitter, far away
In another sky !

©Ila Rani. All Rights Reserved.

The body

The body ,a a galaxy
Stars and nebulae float around
The soul , a nomad,
Never settles for anything
The heart, a bird
Still glides through all this
Whoa ! the life a pallette
And eyes ,the brushes
The mind, an artist
Putting beautiful strokes
Ah ! the body
A universe in whole !!

– inspired from a sketch by my friend

©Ila Rani. A Rights Reserved.

A stupid thought

It happens all the time
And it’s still happening
Something’s there
Something deep
And that gets worse
So much worse
When you are around.

I know
I can’t take my eyes off you
But ,taken for the coward I am
I never even look in your direction
A glimpse
Just one sinuous wrecked little glimpse
Of your ever serious face
Does the magic.

The cheeks wear that shade
That sensuous shade
Of love.
Maroon !!
And my lips
Tremble
Trying to spell out your name.

The veins ,sing
And keep singing.
And keep singing
My head is all filled with stupid thoughts.

And this thing
This love
Is crazy.
I am already a sinner.
For
I know
You love
Someone else.
And that
I shouldn’t flutter around !😅

©Ila Rani. All Rights Reserved.

विद्रोह या अनुरोध ?

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मेरा मन

एक अंधेरा कुआं है

रोशनी दुश्मन है मेरी

सुबुद्धि सौतन

तम श्रृंगार।

मैं, अंधकूप की रानी हूँ

अट्टाहास करती हूँ।

तुम सूर्य हो

दमकते हो

ऊर्जावान हो

जीवन का आधार हो,

मेरी तरफ मत झुको !

रुको ! रुक जाओ !

क्यों कालिमा को अपनाना चाहते हो?

कलुषित होना चाहते हो ?

निस्तेज होना चाहते हो?

मैं अभी भी,

चेतावनी दे रही हूँ,

दूर छिटका रहने दो मुझे

अज्ञेय रहूंगी

गुमनाम रहूंगी

कलंकित हूँ,

शापित रहूंगी।

नहीं, ये किरणें मुझे भरमा रही हैं

कोई कोंपल देहरी से फूट रहा है,

रोको ! रोको इसे !

मैं अंधकूप की रानी हूँ।

अट्टाहास करती हूँ।

स्निग्ध स्पर्शों की आदी नहीं,

इस फूल को उजाड़ दो,

गाड़ दो फिर से धरा में,

किरणों को समेट लो।

यह पुष्प पल्लवित क्यों हुआ,

इसे तुमने क्यों छुआ ?

यह ओस क्यों चमक रही ?

ये हर पहर क्यों झूमता ?

ठहरो !

यह मैं नहीं।

यह मैं नहीं।

कैसे बदल गई ये हवा,

कैसे है बदला ये गगन,

क्यों किरण मुझे चूमती ?

कोयल कहीं गाती मगन ।

हटो,

राग नहीं चाहिए

ताल नहीं चाहिए

छंद नहीं चाहिए

गान नहीं चाहिए।

मैं अंधकूप की रानी हूँ ?

अट्टहासकरती हूँ ?

©इला रानी। All Rights Reserved.

ओ साँवले लड़के -2

तुम मुझे रंग-भेदी कहोगे,

मैं मोहित हूँ तुम्हारे रंग पर,

जिसपे कोई और रंग नहीं चढ़ सकता,

जो शुद्ध है, सोने से भी खरा।

ओ सांवले लड़के !

काली- काली आंखों वाले,

तीखे- तीखे बातों वाले…

ओ सांवले लड़के !

मेरा रंग ढल रहा है,

मेरा तन- मन- वसन, बदल रहा है

मैं शर्मीली हो रही हूँ,

तुमको छू रही हूँ,

ओ सांवले लड़के !

मुझको संबल देने वाले,

अर्थ शब्द को देने वाले,

ओ सांवले लड़के !

कितने चुपचाप रहते हो,

गिनकर दो बातें कहते हो,

पर जो कहते हो सच कहते हो,

मेरे मन को बहकाते हो ?( गुस्से में!:) )

ओ सांवले लड़के !

चतुराई से चलने वाले,

मेरे अंतस को ठगने वाले,

अपनी दुनिया एक बुनने वाले

मुझको तितली से रंगने वाले

ओ सांवले लड़के !

©इला रानी। All Rights Reserved.

संवाद

कभी – कभी, शब्द निरर्थक होते हैं

अनावश्यक भी,

क्षण भर की भाव- भंगिमा

सब सामने रख देती है।

तब शब्द, कठपुतलियों से लगते हैं

बिना डोर के,

बिन मालिक के

बिखरे हुए, बेजान पड़े।

आवेग , क्रोध और तीक्ष्ण घृणा,

इन्हें शब्द जरूरी नहीं।

बिल्कुल नहीं।

समय बोल उठता है उसी क्षण

नेत्रों की बोलियाँ

काँपती ,रोमांचित होती त्वचा से

स्वेद-कण छूटते हैं

सब स्पष्ट हो जाता है

शब्दों के बिना।

©इला रानी। All Rights Reserved.

गीत

रंगोली सा आकाश

उपवन सी ये धरा

क्षितिज पर ,आलिंगनबद्ध हैं।

धीरे – धीरे

अम्बर श्याम वर्ण हो जाएगा

धरा भी श्याम वर्ण हो जाएगी

अम्बर तारिकाएं बरसायेगा,

धरा केश अपने लहरायेगी ,

रात्रि की मादकता

दोनों को हर्षाएगी

फिर आएगी भोर नई

अम्बर में रंग भर जाएगा

सतरंगी धरा मुस्काएगी ।

©इला रानी। All Rights Reserved.