सुर

भारतीय शास्त्रीय संगीत विश्वपटल पर नित ही अपना परचम लहराता रहा है और यह संगीत ईश्वर की साधना और स्वयं की पहचान करने का एक मार्ग है |

इस तथ्य को समझना और समझाना लेकिन बड़ा ही कठिन है |

संगीत की साधना भी योगी के तप के समान है, क्योंकि सुरों का ज्ञान बहुत चेष्टा और जीतोड़ मेहनत करने पर ही आती है | एक अच्छे गुरु और उम्दा शिष्य की संगत में ही संगीत की पराकाष्ठा पर पहुँचा जा सकता है | जब संगीतज्ञ की उंगलियां तानपूरे को छेड़ती हैं, और वो ध्वनि साज से निकलकर हृदय तक आती है, और फिर सुरों के मेल के रूप में कण्ठ से बाहर आती है, तब जो सुखद अनुभूति गायक को होती है वह किंचित शब्दों के माध्यम से चित्रित नहीं की जा सकती है |

एक कविता

जब सुर सच्चे लगते हैं ना,

तब रोम -रोम गा उठता है |

ठहर जाता है वो क्षण,

पुलकित मन साधनालीन हो जाता है |

सच कहते हैं गुरूजी

ईश्वर में स्वर से सिर्फ एक

‘ई ‘ ही तो कम होता है,

वरना सुर साक्षात् देवरूप ही होता है

-इला रानी

©Ila Rani. All rights reserved.

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आलिंगन की अभिलाषा

एक आलिंगन में कभी कभी हर दुःख हर लेने की क्षमता होती है, खासकर तब जब ये सप्रेम आलिंगन प्रियतम का हो ! प्रेयसी का हठ बड़ा ही करुण होता है और इस आलिंगन के निवेदन में भी बड़ी मादकता होती है |

विकट समयाभाव में भी ये एक कृत्य बड़ा सुखद जान पड़ता है |

दो क्षण की सुन्दरता, ताउम्र यादों में बस सकती है ||

कुछ शब्द इसे बताते हुए :

आलिंगन

••पथ धूमिल है,
पर चल देती हूँ.

समय खींचता
हाथ मेरा.

बढ़ कर,
तुम भी,
कह दो ना प्रिय !
प्रेम पाश में,
जकड़ो ना प्रिय.
अब तो आलिंगन,
कर लो ना प्रिय !!!!••

आज अंग्रेजी भाषा में भी इसका अनुवाद ना सही, पर उन्ही भावों का चित्रण करने की कोशिश करुँगी |

The sweet embrace

Untrodden paths

Stand before my eyes.

I behold

How drearer this moment is!


I long for

Your embrace

It’d heal me

From within.

I request thee,

O my heart !

Hold me tight,

In your sudden soothing embrace.


I long for

Your unadulterated love.

For,

Your undaunted heart

Is where I belong

Is my abode!!!!

– इला रानी

© Ila Rani. All rights reserved.

सखि के लिए

सखि – ये शब्द सुनने में जितना मीठा है, इस सम्बोधन को पाने वाली और देने वाली, दोनों के बीच भी बड़ी प्यारी गूँज होती है, एक गीत की, जो सतत चलती रहती है, सुदूर वनों के जलप्रपात सी गूंजती रहती है !

यह झनक होती है उस सम्बन्ध की, जो जन्म से शुरू तो नहीं होती, परन्तु जन्मों जन्मों तक निबाही जाती है | ईश्वर भी सदैव सराहता है जिसे और आम भाषा में हम जिसे “मित्रता ´´ कहते हैं |

मैत्री में बोला गया हर शब्द वेदपाठ सा पावन होता है| और सखी का हर एक कार्य मन की वेदना का वेदनाहर होता है |

सखि की इसी विशेषता को बताती एक कविता प्रस्तुत है | सखि के लिए मंगलकामना और उत्साहवर्धन करती हुई एक प्रस्तुति :

माया – सखि मेरी

तुम दीपशिखा सी उज्ज्वल हो,
तुम प्रेम सरीखी सखि मेरी
तुमको क्या क्या उपमाएं दूँ?
तुम सबसे प्रिय हो सखि मेरी !

छीने ना कोई मुस्कान अधरों का,
अपना सम्बल कायम रखना |
करती हूँ यही निवेदन तुमसे,
बस जैसी हो वैसी रहना ||

मैं नित करूँ प्रार्थना देव से,
दैव तुम्हारा सबल रहे |
छू लो वितान की ऊंचाइयों को,
मन ऐसा ही दृढ़ -प्रबल रहे ||

– इला रानी

©Ila Rani. All rights reserved.

प्रेम

आज एक बेकार तुकबंदी लिख रही हूँ ! शब्दों से शून्य हो जब कलम, तब यही सब होता है |

लेकिन समझने वालों को ये रचना हो सकता है गुदगुदा जाए |

प्रेम

तपती दोपहरी में तुम्हें आम की छांव लिखती हूँ,
`प्रेम ´ तुम्हें अपना वो छूटा गाँव लिखती हूँ |

रोज़ भरती हूँ पन्ने मन की किताब के,
`प्रेम ´ तुम्हें अपनी प्रीति का ठाँव लिखती हूँ |

नित नये छंद, नई कविता कभी लिखती हूँ कोई कहानी,
प्रेम ! इस मझधार का मैं तुमको नाव कहती हूँ |

ढूंढती हूँ मासूमियत तुम्हारी, खिलते हुए गुलाबों में,
प्रेम ! तुम्हें अमिट प्रेम का पर्याय लिखती हूँ !!

– इला रानी

©Ila Rani. All rights reserved.

लाज

लाज, लज्जा, शर्म, हया जो भी कह लें, ये वही अर्धविराम है जो प्रेम के प्रकाट्य में बाधक होती है लेकिन प्रेम को गहराई भी यही तत्व बढ़ाते हैं|और प्रिय की प्रतीक्षा में बिताए छण भी बहुत सुखदायी होते हैं |एक कविता :

लाज

बाट निहारत

नैन थकते |
नहीं एक पल
भी झपकते |
बौराया मन,
तुम बिन |
पल पल
क्षण क्षण ||

झम झम,
बरसे मेह |
बरसा क्या
तुम्हारा नेह?
बरसे मेरे
भी लोचन |
लगी जो,
तुमको सोचन ||

मेरा चितवन,
मोह रहे |
क्यों व्याध सा
टोह रहे?
करें ठिठोली
देखो सखियन |
कहतीं जोगन
कहतीं जोगन ||

छोड़ो !
रहने दो !
कर ही लूँ
मन पावन |
आने दूँ
तुमको मनभावन |
कह ही दूँ
मन की बतियन||

प्रेम पुकारूँ
प्रेम निहारूँ
प्रेम नहीं !
पर प्रेम मगन |
भूल गई
सब बतियन
ए री !
लाज की
सब बतियन ||

© Ila Rani. All rights reserved.

मेरी छवि

हम कितने सशक्त हैं? क्या सिर्फ अपने विचारों में ही एक विशिष्ट छवि बना रखी है, क्या ये एक मृगमरीचिका है? अपने आप को कितना समझते हैं हम, क्या समझते भी हैं !!!

मेरी छवि

मैं नहीं कम्पित अधरों वाली.
मैं नहीं हूँ सजल नेत्रों वाली .
हाँ ! ‘प्रेम ‘ अचल है हृदय में मेरे,
पर, आडम्बरों में नहीं घिरने वाली.

लज्जा है, है अभिमान अस्तित्व का,
नहीं रोके से रुकने वाली.
मैं ‘रश्मि ‘ हूँ दिनकर की,
हर तम का नाश करने वाली.

मैं नहीं कम्पित अधरों वाली ??

– इला रानी

समाज का दोहरा चेहरा

प्रायः प्यार सराहा जाता है सिनेमा में, धारावाहिकों में, वेब सीरीज में, पवित्र ग्रंथों में, कविताओं में, निबंधों में , लेकिन समाज में ये अब भी घृणित है, वर्ज्य है. इसी विडम्बना को बताती एक ग़ज़ल :

इश्क़

मौत मयस्सर नहीं, ज़िन्दगी की बात करते हो
इस बियाबान में बगीचे की बात करते हो !!

कलियाँ कुचली गईं अपनों के अरमानों तले,
तुम गुलाबों से इत्र चुरा लेने की बात करते हो !!

धुआं सांस सा आता जाता है सीने से,
और मुक़र्रर इश्क़ कर लेने की बात करते हो !!

जहर घोल दिया है किसी ने हर घूँट में उल्फत के प्यालों की,
फिर भी, तुम जाम फ़क्र की पी लेने की बात करते हो !!

है काफी नहीं क्या की इकरार-ए-जुर्म कर ही लिया मैंने,
क्यों बेमतलब “अपनी “बेगुनाही साबित करने की बात करते हो !!

नसीब था मेरा की मुझे सलाखें मिलीं ,
दीदार कर ही लिया ना हर बदी का मैंने.
क्यों अब ऐसी नेकी की बात करते हो,
दाग दामन से मेरे धो देने की बात करते हो !!

उफ्फ !तुम भी कैसी ये बेतुकी बात करते हो?!
सज़ा पूरी करने पे कैदखाने से बाहर लाने की बात करते हो !!

– इला रानी

© Ila Rani. All rights reserved.