आधी बात

शरमाता सा पूर्ण चंद्र
शरद ऋतु की रात ।
ऐसे में क्यों आधी है
मधुर प्रेम की बात ?

– इला रानी

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स्वप्न

वो कौन गाता है वहां

आमों की अमराई में?

वो कौन रोता अकेला

छुपा अपनी परछाई में ?

वो कौन जो चुन चुन बिखेरे

स्वप्न सभी अंबर की गोद से,

कौन वो जो लिखता है नित

गीत मिलन और बिछड़न के?

कौन धुएँ सी धुंधली होती

यादों की झील में डूबा है

कौन है जो सागर में रहकर

भी बिलकुल ही प्यासा है?

कौन तुम , कौन मैं

है यही नीयति संसार की

कौन निशा में नहीं पलकों में

सूरज एक संजोता है !!!

Just a thought

कोई भी इंसान जो खुद को कवि समझता है शायद सबसे पहले प्रेम गीत ही लिखता है, क्योंकि मनुष्य की ये प्रवृत्ति है की जो वस्तु उसे सुगमता से प्राप्त ना हो, किसी बहाने इस भ्रम में तो जी लेना चाहता है की कल्पना में उसकी इच्छायें पूरी हो रही हैं |और प्रेम गीत के माध्यम से शायद वह अपने प्रेम को पा लेता है या शायद अभिनय कर लेता है |

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बसंत (भाग 1)

“मुझे याद नहीं की पहले दिन जब मैंने आपको देखा था तो आपने किस रंग की शर्ट या किस रंग का जीन्स पहना था |उस दिन आपका चेहरा कैसा लग रहा था और आप कैसे मुस्कुराए थे, ये भी याद नहीं |नहीं ! मुझे पहली नजर का प्यार कतई नहीं हुआ था |वो दिन, समय, आपकी आँखों का रंग कुछ भी तो याद नहीं मुझे |हम दोनों निरे अजनबी थे उस समय |एक नजर देखा तो होगा आपने मुझे भी और मैंने भी |आमने सामने जो बैठे थे हम दोनों |लेकिन किसी के दिल में कोई भी हलचल नहीं हुई, साँसे तेज नहीं हुई, गालों पे अबीर नहीं चढ़ा |तो यूँ बोलूँ की ये पहली नजर का इश्क़ नहीं था |

लेकिन आज की स्थिति कुछ और है | इतने दिनों के बाद मैं आपको समझने लगी हूँ | आपकी होने लगी हूँ और यूँ आपका होते जाना मुझे बिलकुल भी बुरा नहीं लगता |और ये जो सम्बन्ध है हमारा ये प्यार, मुहब्बत जैसे नामों से परे किसी और दुनिया का कोई भाव है जो अब इस कदर बढ़ चला है की दुनिया के रोके ना रुकेगा |”

आकृति बस लिखती जा रही थी अपनी डायरी में….

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