ओ साँवले लड़के -2

तुम मुझे रंग-भेदी कहोगे,

मैं मोहित हूँ तुम्हारे रंग पर,

जिसपे कोई और रंग नहीं चढ़ सकता,

जो शुद्ध है, सोने से भी खरा।

ओ सांवले लड़के !

काली- काली आंखों वाले,

तीखे- तीखे बातों वाले…

ओ सांवले लड़के !

मेरा रंग ढल रहा है,

मेरा तन- मन- वसन, बदल रहा है

मैं शर्मीली हो रही हूँ,

तुमको छू रही हूँ,

ओ सांवले लड़के !

मुझको संबल देने वाले,

अर्थ शब्द को देने वाले,

ओ सांवले लड़के !

कितने चुपचाप रहते हो,

गिनकर दो बातें कहते हो,

पर जो कहते हो सच कहते हो,

मेरे मन को बहकाते हो ?( गुस्से में!:) )

ओ सांवले लड़के !

चतुराई से चलने वाले,

मेरे अंतस को ठगने वाले,

अपनी दुनिया एक बुनने वाले

मुझको तितली से रंगने वाले

ओ सांवले लड़के !

©इला रानी। All Rights Reserved.

संवाद

कभी – कभी, शब्द निरर्थक होते हैं

अनावश्यक भी,

क्षण भर की भाव- भंगिमा

सब सामने रख देती है।

तब शब्द, कठपुतलियों से लगते हैं

बिना डोर के,

बिन मालिक के

बिखरे हुए, बेजान पड़े।

आवेग , क्रोध और तीक्ष्ण घृणा,

इन्हें शब्द जरूरी नहीं।

बिल्कुल नहीं।

समय बोल उठता है उसी क्षण

नेत्रों की बोलियाँ

काँपती ,रोमांचित होती त्वचा से

स्वेद-कण छूटते हैं

सब स्पष्ट हो जाता है

शब्दों के बिना।

©इला रानी। All Rights Reserved.

गीत

रंगोली सा आकाश

उपवन सी ये धरा

क्षितिज पर ,आलिंगनबद्ध हैं।

धीरे – धीरे

अम्बर श्याम वर्ण हो जाएगा

धरा भी श्याम वर्ण हो जाएगी

अम्बर तारिकाएं बरसायेगा,

धरा केश अपने लहरायेगी ,

रात्रि की मादकता

दोनों को हर्षाएगी

फिर आएगी भोर नई

अम्बर में रंग भर जाएगा

सतरंगी धरा मुस्काएगी ।

©इला रानी। All Rights Reserved.

Horizons

He painted it.

A silhouette on a vibrant summer evening sky

Holding a bunch of wildflowers

Which sway with the slightest breeze

Wow! He gasps

The mountains standing over the horizon

Fade away with every passing moment

The sky suddenly all glittery

The flowers still fresh

A new thought finds space

Fits itself in the moment,

He has dreams

Of love, desires, passion

Of success,wealth and splendor.

The sky glitters more

The moon shining bright

He stares at the flowers

For so long, so ,so long

He’ll gift them to the most precious soul

Who stands beyond that horizon

If he ever met him

A night lark glides by

Chirps, sings

He’ll some day realise

The beautiful soul

Hidden now

Beyond those mountains

Is none other than

His very self !

©Ila Rani. All Rights Reserved.

दुःस्वप्न

मैं कल्पना में जी रही हूँ

तुम मेरे पास हो

बिल्कुल पास

हमारे होंठ, कांप रहे हैं

धड़कनें तेज़ हो रही हैं

मेरी सूखी चमड़ी से

पसीना आने को तैयार है

मेरी नसों में जहर भर गया है

मैं ज्वालामुखी सी धधक रही हूँ

तुम कुछ कहना चाहते हो

तुम्हारी आँखे बोल रही हैं

मैं सुन नहीं पा रही

समझ नही पा रही

अचनक से, तुम ठहर जाते हो

निष्प्राण दिखते हो

चौराहे की मूर्ति की तरह।

तुम मुझे दूर धकेलना चाहते हो शायद,

मेरी सूखी चमड़ी तुम्हें आकर्षित नहीं करती ,

तुम अप्सरा ढूंढ रहे हो !

हूर ढूंढ रहे हो !

मैं तो बस एक औरत हूँ

हाड़ -मांस की बनी

भावनाओं से भरी

गगरी हूँ, पल -पल छलकती हूँ।

सांस लेती हूँ

रोती हूँ, विद्रोह करती हूँ।

बोलती हूँ,

सुनाती हूँ

सहती हूँ, असह्य हो जाती हूँ

सबल हूँ, निर्बल हूँ

इंसान हूँ।

इसलिये,

तुम्हें कुछ दिखाना चाहती थी

अब आँखें बंद कर लूँगी

होठ सी लूँगी

बुत बन जाऊंगी

तुम्हारी तरह,

यह सोचते भर में

एक दस्तक हो रही है,

कोई चीख रहा है,

दरवाजे को पीट रहा है ।

मेरी नींद खुल चुकी है।

मैं अब भी पसीने से तरबतर हूँ,

लेकिन तुम कहीं दिखते नहीं !

अच्छा है, सपना था शायद ।

मैं बदली नहीं।

बुत नहीं बनी।

फिर से सांस ले रही हूँ ।

आँखे चौड़ी कर पा रही हूँ

मुस्कुरा रही हूँ।

©इला रानी.All Rights Reserved

समानता – एक श्राप

एन. सी. ई. आर. टी. के सामाजिक विज्ञान की किताब में एक पाठ है – इक्वलिटी, यानी कि समता, समानता और उसमें बड़े ही सुंदर ढंग से इस किताबी बात की जीवंत व्याख्या की गई है। अलग अलग पात्रों के माध्यम से, स्वास्थ्य सुविधाओं की पृष्ठभूमि पर। एक पात्र कहती है कि शायद हम सब बस इलेक्शन यानी चुनाव वाले दिन ही बराबर होते हैं, एक ही लाइन में, अलग अलग कपड़ों में, पर उंगली पर स्याही एक ही रंग की, एक ही बोतल से निकली हुई होती है। बाकी दिनों में ये रंग फीका पड़ता जाता है और समानता का हौव्वा भी। यूँ भी शायद अर्थशास्त्र कहता ही है की समाज में थोड़े- बहुत, थोड़े कम बहुत ज्यादा भिन्नता होनी ही चाहिए, खासकर मेहनताने, मेहनत और पेट से जुड़े सभी मामलों में। यही कारण है की कुछ आबादी पेट पिचकाना चाहती है, जिम में कूदकर और किन्ही बच्चों का पेट झुनझुने के मोटे अंग की तरह मोटा हो गया है और हाथ- पैर माचिस की तीलियों की तरह पेट से चिपके हैं।जंगलों में सुनियोजित तरीके से आग लग रही है, साल भर बाद हाईवे जो गुजरना है वहां से। खैर यह तो ठंडे घरों में ,बड़े रेस्त्रों में और होटलों में सामाजिक और पर्यावरणीय संस्थाओं की बातें हैं, मुद्दा अभी समानता का है।

समानता ,जो प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर,समान संसाधनों और समान सामाजिक परिस्थितियां प्रदान करने का नाम है, विलुप्तता के कगार पर आ पहुंची है।समानता एक महंगी वस्तु है। पूंजीपतियों को भी समान अवसर प्राप्त नहीं होते उद्योग खड़े करने के क्योंकि समान पदों पर बैठे महान नेताओं तक पहुंच में भी असमानता है। इसलिए इक्के- दुक्के अमीरों के नाम नित्य ही एक बहुत ही महत्वपूर्ण पत्रिका में कई पायदान चढ़ता रहता है, अलग बात है की दूसरी ओर भुखमरी का ग्राफ भी चौगुनी तेज़ी से ऊपर बढ़ रहा है। खैर ये, भी लेफ़्टिस्ट लोगों की ही चाल होती है। अमीर होती आबादी उन्हें दिखती ही नहीं। उद्योग बढ़ रहे हैं, उनमें काम करने वाले कामगर, सड़कों की लंबाई और भवनों की ऊंचाई भी बढ़ रहे है, साथ ही मिल रहा है दिहाड़ी मजदूरों को रोजगार, उनके बच्चे मगर नेपोटिज्म से बाहर नहीं आना चाहते ,न ढंग से खाते हैं, ना पहनते हैं, पढ़ते तो बिल्कुल नहीं और बीमार रहते हैं सो अलग। कैसे बताया जाए इन्हे की अच्छे प्राइवेट विद्यालय में जाना चाहिए, तगड़ी फीस भरनी चाहिए, आई.आई. टी. में दाखिला लेना चाहिए, गूगल- माइक्रोसॉफ्ट का सी. ई. ओ. बनना चाहिए, लेकिन ये ठहरे ढीठ न भई हम तो मजूरी ही करेंगे, जिम जाने से तो बचेंगे कम से कम, बॉडी मजबूत होगी सो अलग।

आजकल बड़े शहरों में समानता के अवसर बढ़े हैं लेकिन, पिछड़े- आदिवासी बहुल राज्यों से आने वाले बच्चे भी जीवन-भर बड़े-बड़े घरों में रहने लगे हैं, बड़े-बड़े मॉल जाने लगे हैं, बड़े – बड़े रेस्तरां जाने लगे हैं,बस छोटे-मोटे स्कूल तक का नाम नहीं देखा इन्होंने क्योंकि पढ़ाई कोई जरूरी चीज नहीं है ;अनपढ़ रहेंगे तो क्या पता चुनाव का टिकट ही मिल जाए कहीं से। ये आजीवन बंधुवा मजदूर हो गये हैं तो क्या, जमीन पर सीढ़ी के नीचे सोते हैं मजे से, बुखार तो असर ही नहीं करता इनपर और स्वाभिमान नाम का शब्द इन्होंने कभी देखा ही नहीं। खैर वो जरूरी भी नहीं।और समानता इतनी ज्यादा इन घरों में की ये बच्चे और इनके मालिकों (दास प्रथा गयी नहीं शायद) के बच्चे एक से कपड़े पहनते हैं , इनका थोड़ा रंग फीका रहता है।

लेकिन चटक रंगों से जितनी जल्दी परहेज किया जाए उतना ही अच्छा है, चटकीले रंगों वाले कीड़े अमूमन विषैले होते हैं। चटक बोलियों वाले लोग भी शायद। इएलिये फीकी जिंदगी बेहतर है, फीकी चाय लो तो शुगर का खतरा कम, चीनी के पैसे बचेंगे वो अलग और फीकापन मध्यवर्ग का चोला है, इस लिबास को उतारते ही समानता का भूत आ पकड़ता है। तो, डायटीशियन होने के नाते मैं सलाह दूँगी की उपर्युक्त लेख के समान लेखों से, चीनी से और समानता से सौ गज की दूरी बनाए रखें। सावधान रहें, सतर्क रहें , कुबेर की पूजा न करें।

©इला रानी। All Rights Reserved.

बेकार की बातें

पहले रातें अच्छी थीं, अब रौशन हो गयी हैं ।सच कहूँ तो ये रोशनी मुझे बिल्कुल पसंद नहीं। जंगल उजाड़कर सड़क बनाई और फिर फ्लाईओवर ऊगा लिया। मोटे-मोटे ट्रकों के बोझ से दबता जा रहा है बेचारा। और मकान तो आसपास कुकुरमुत्ते की तरह उगेंगें ही, गीली मिट्टी में, बूढ़े पेड़ों की पुरानी लकड़ियों में सड़न जो पैदा हो गयी है। पहले बारह किस्म की चिड़िया चहचहाती थीं, अब दो भी नहीं हैं। कौवे तो जाने कहाँ गायब हो गए ! उनके बारे में भी लिखूंगी कभी। अब पचहत्तर किस्म के हॉर्न सुनती हूँ। नींद अचानक खुल जाती है,लगता है मुझपर कोई टैंक चढ़ गया हो। लेकिन खिड़की खोलने पर दिखता है वही मोटा ट्रक, जिसपर मोटे- मोटे ट्रेक्टर, सिलिंडर और भी न जाने क्या-क्या लदे हैं। और भौतिकी के “एव्री एक्शन हैज ऐन इक्वल एंड अपोजिट रिएक्शन” या यूं कहूँ जैसे को तैसा वाले सिद्धांत के आधार पर ,प्रकृति को मारते ही आदमी की शांति भी मर जाती है, आम आदमी की। खास तो रूम में साउंडप्रूफ, बुलेटप्रूफ और भी न जाने क्या क्या प्रूफ कर कर रख लेते हैं। खैर, प्यारी नींद तो पहले प्यार की तरह परायी हो चुकी है ,कोई वास्ता ही नहीं उससे। दो- चार गमले हैं, उससे बागवानी का शौक पूरा हो जाता है। पहले, तीस किलोमीटर दूर वाला ढिमका पहाड़ नज़र आता था छत से,अब गायब हो गया है शायद या सड़क लील गयी होगी।

खैर, नींद कोई जरूरी चीज तो है नहीं ।वैसे भी अब चौबीसों घंटे काम तो करना ही चाहिए, खासकर प्राइवेट कंपनी के कर्मचारी को। सो, कर रही हूँ। पहले दिन से ही पता था कि यही गति होगी, सो हो रही है।और प्रमोशन के इंतज़ार करना अच्छा है, सेहत के लिए, बस यही की कुछ दिनों में डॉक्टर निहाल सेठिया, वही शुगर वाले, उनसे अपॉइंटमेंट लेना होगा। बच्चों को प्राणी- विज्ञान सिखानाआसान काम तो है नहीं, ऊपर से रिप्रोडक्शन, सेक्स,सेफ सेक्स, टीनएज लाइफ, अडोलएसेंस या किशोरावस्था और फलाना ,चिलाना,ढिमकाना बातें समझाने में सर दर्द तो होता ही है, उन्हें एनाटोमी अब ज्यादा सहज रूप से इंटरनेट की मदद से पता चली ही जाती है। खैर ये तो मेरे निजी जीवन की परेशानी है, किशोरों और किशोरियों को संभालना ।लेकिन काश की मेरा थोड़ा बस चलता और मैं ये सड़क मिटा पाती।सो पाती। प्राणी-विज्ञान, प्राणियों का महत्व, चिड़ियों का महत्व, पहाड़ों,जंगलों और झरनों का और हां रात का महत्व किसी एक को भी समझा पाती।

खैर, प्राणी- विज्ञान एक किताबी बात है, और किताब की बातें असल जीवन में कभी आनी नहीं चाहिए, ऐसा मुझे पड़ोस वाली आंटी जी बता रहीं थीं क्योंकि मेडिकल नहीं निकाल पाने से वैसे भी लड़कियां सुंदर, योग्य बहु बनने के लिए और भी फिट हो जाती हैं। प्राइवेट स्कूल की टीचर से ज्यादा आदर्श बहु और कहां मिलेगी, घर के बच्चों का ट्यूशन भी मुफ्त, सुबह शाम के काम भी मुफ्त।

क्यों? प्लॉट में ट्विस्ट आ गया। ये भी मेरे अधकचरे सपने की तरह है, उनींदी आंखों से लिखी पंक्तियाँ है। खैर, पेड़- पौधे फर्नीचर के लिए और लड़की नौकरानी बनने के लिए होती है ये भी समाजशास्त्र का अनलिखा सिद्धांत है। और अपढ़ होने में स्वर्ग मिलता है, मैंने ये भी सुना था।

©इला रानी। All Rights Reserved.

घर पर हूँ

आजकल अच्छा लगता है। घर पर हूँ। कमरे के भीतर। छत पर भी जाना कभी -कभी ही नसीब होता है। किताबें पढ़ रही हूँ, फिल्में देख रही हूँ, इंटरनेट का सदुपयोग कर रही हूँ। हाँ, दिनभर और रातभर स्क्रीन पर देखते- देखते आँखें दुखती हैं ,लेकिन फिर भी इत्मीनान है।कम से कम ऑटो पर, बस पर ,पब्लिक ट्रांसपोर्ट में चलना तो नहीं पड़ेगा। दोनों हाथ कमर, पीठ और छाती कि सुरक्षा में अकड़ाकर दर्द होने कि स्तिथि में तो नहीं आएँगे। बगल से कोई अधेड़ उम्र का आदमी ताने नहीं कसेगा, और अपनी उघड़ी कामुकता का नाच नहीं दिखा पाएगा। राजधानी की सबसे व्यस्त सड़क पर, चौराहे पर, नशे में धुत्त, सुध-बुध खोये, अधनंगे बदन वाले ,मैले बालों वाले बच्चों को तो नहीं देख पाऊँगी जो आये दिन कटोरा लेकर, और मुँह की ओर इशारा करके पेट की हालत बताते फिरते थे। ऑटो ड्राइवर तो- “भाग साले! मेडम को मत परेशान कर !”, वाला डायलॉग भी नहीं मारेगा। मुझे दुःख होता था क्या उस दृश्य को देखकर? हाँ, बहुत ,लेकिन उससे ज्यादा बुरा तब लगता था जब खुली आँखों पर न्याय की देवी से भी ज्यादा बड़ी पट्टी बांधनी पड़ती थी, हाथ- पैर सिकोड़कर मोबाइल पर ध्यान लगाना होता था। दुःख होता था ट्रैफिक पुलिस वाले को देखकर, बेचारे का मुँह सीटी बजाते- बजाते थक जाता था, सूज जाता था, डण्डा मारते हुए हाथ झनझना जाता था। और कभी- कभार हज़ार तरह की गालियाँ भी सुननी पड़ती होंगी उसे। क्या उसके सिर में दर्द नही होता, मैं हमेशा ये सोचती थी। शायद ड्यूटी के प्रेशर से खत्म हो जाता होगा, शायद।

मैं उस भिखारिन के बारे में भी नहीं सोच पाती, अच्छा लगता है ,की अब उसकी पैर में बंधी पट्टी रोज़- रोज़ बदलने से बच जाती होगी। उसके काले देह के मुकाबले ,उतना हिस्सा थोड़ा कम काला रहता होगा। किसी दिन उसकी आत्मकथा लिखूंगी।

रिलायंस फ्रेश के किनारे वाले लेबर मार्केट को भी अब देखना नहीं पड़ता। अच्छा है। सूखे हुए, शोषित ,दलित ,हड्डी के ढांचे कौन देखना चाहता है। वैसे भी ये सारी चीजें एनजीओ वगैरह के सुंदर कर्मों का हिस्सा होते हैं, मेरे जैसी आम लड़की को इसमें कोई दिलचस्पी भी नहीं होनी चाहिए। पाप लगेगा वरना। काम हमारे लिए बस सरकारी नौकरी ढूँढेने तक कि, या प्राइवेट स्कूल की शिक्षिका बनने और फिर सुंदर से घर- बार बसाने तक कि ही होनी चाहिए। ऐसा मैंने नातेदारों के सुंदर, सुशील ,सभ्य मुखों से सुना है। सही भी है, पैसा जरूरी है, फिर उस पैसे को खर्च करने के लिए, संतति पैदा करना, फिर उसके भविष्य के लिए बचत करना और पैसे जोड़ना, जरूरी है। जरुरी नहीं है तो बस एक चीज, समाज के मामलों में नाक घुसेड़ना, मुँह चलाना, दिमाग दौड़ाना वगैरह। और घर पर रहते हुए मुझे बहुत आराम है। मेरी सारी खिड़कियां बंद हैं और दरवाजे तो मैंने वैसे भी नहीं देखे हैं।

लिखूंगी कभी, कहानियां, शायद।

जारी……..

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ढेला (समाज की – “प्रगति” -भाग 1)

“कितना दे सकते हैं ? इंजीनयर है लड़का, पिताजी सचिवालय में थे, तीन मंजिला मकान है वो भी रोड़ किनारे , आठ एकड़ जमीन गांव में, मटर की खेती और लगभग गोरा- नारा ही है। बाईस लड़कियां रिजेक्ट कर चुका है। प्रगति के लिए ठीक ही रहेगा ,बस थोड़ा दिमाग कम चलाये तो।”

लड़की का बाप कुछ बोले उससे पहले ही लड़की बोल पड़ी – “ढेला ” ,वो भी कान – कपार फोड़ने वाला , ट्रक भर के।

फूफाजी का मुँह देखने लायक था।

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